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केवल मैं और आप ही नहीं अपितु समस्त संसार एक ही परमात्मा को पूजता है और उसको मानता है। मानने का तरीका सबका अपना-अपना और अ...
एक परमात्मा
केवल मैं और आप ही नहीं अपितु समस्त संसार एक ही परमात्मा को पूजता है और उसको मानता है। मानने का तरीका सबका अपना-अपना और अलग-अलग हो सकता है, किन्तु मानते वो उस एक परमात्मा को ही हैं? पर उस एक को जानते कितने हैं? अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को कमतर मानना, ये मानव की अपनी स्वभाविक भूल है, क्योंकि स्वभाव मानव की जड़ प्रवृत्ति है। इस कारण संसार में कुछ लोग स्वभाव के अधीन होकर उस कुएँ के मेंढक की तरह हो जाते हैं जो टर्र-टर्र तो करना जानते हैं किन्तु कभी उस कुएँ से बाहर निकलकर कुछ और जानने का प्रयास नहीं करते। ऐसे ही ये लोग एक सम्प्रदाय
के ही हो जाते हैं। दूसरे के बारे में जानना ही नहीं चाहते। इस तरह कुछ लोग कोल्हू के उस बैल की तरह होते हैं, जो रूढ़िवाद को ही अपना धर्म मान लेते हैं और एक ही जगह का चक्कर लगाते रहते हैं तथा कभी दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। इससे थोड़ा ऊपर आने वाले लोगों को बाड़े की भेड़ कहा जा सकता है, जो लकीर के फकीर बनकर बिना सोचे समझे एक के पीछे चलने लगते हैं और अपने आपको अंधे कुएँ में धकेल लेते हैं। इन सब बातों को गौर से समझें और विचार-विमर्श करें तो पाएंगे कि हम में और पशु में क्या अंतर रह जाता है। जब तक हम स्वभाव को धर्म समझकर ऐसा करते रहेंगे तब तक हम एक जन्म से दूसरे जन्म में आते और जाते ही रहेंगे।
धर्म सनातन है सम्प्रदाय नहीं और सनातन धर्म मर्यादित होता है, परम्परावादी नहीं। परम्पराएँ बदल सकती हैं मर्यादा नहीं। परम्परा को परिपाटी में बदलकर कोल्हू के बैल बन जाते हैं। जिस दिन हम अपने आप को जान लेंगे तो परमात्मा के प्रति समर्पित होकर उस सनातन को पा लेंगे, इसके लिए चिंतन और मनन जरूरी है।
भगवत गीता पढ़कर, धर्म को जानकर और गुरुओं की मानकर ही उस एक परमात्मा को जाना जा सकता है। जिस दिन हम उस एक को जान जाएंगे तो अपने आप नेक हो जाएंगे। गीता का ये ज्ञान व्यक्ति में आत्मविश्वास जगाएगा और गुरुओं के प्रति श्रद्धा उत्पन्न कराएगा तो ही धर्म में आस्था जागृत होगी। धर्म में आस्था होते ही उस एक परमात्मा में निष्ठा हो जाएगी। जब एक में निष्ठा हो जाएगी, तो फिर इस सच को जानकर उस एक से सीधा सम्बन्ध होकर अज्ञानता से ऊपर उठकर, ज्ञान के उस प्रकाश में धर्म, देश की सीमाओं को पार करता हुआ संसार के हर प्राणी में दया का भाव जगाएगा। जब दया का भाव होगा तो प्रेम हमारे अंतकरण से उपजेगा। जब सब प्राणियों में प्रेम होगा तो यह दुनिया स्वर्ग से भी सुन्दर बन जाएगी। फिर ये एक परमात्मा सबमें एक समान दिखाई देने लग जाएगा। इसके लिए हमें अपने अंदर जाकर दिल की सुननी होगी, मन की नहीं। मन सदैव बाहरी चीजों की ओर भागता है, इसी कारण मन भटकता है। मन अज्ञानता का ही परिचय देता है। मन की करेंगे तो कभी किसी से प्रेम नहीं कर पाएंगे। मन को तो मौन करना होगा। जब मन मौन हो जाएगा तब हम दिल की सुनने लग जाएंगे। वैसे दिल हृदय का ही हिस्सा है। वो केवल धड़कता है न वो सुनता है और न ही वो कुछ कहता है। पर अज्ञानतावश हम ऐसा ही समझ बैठते हैं। जिसको हम दिल की बात कहते हैं दरअसल वो दिल नहीं आत्मा है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। आत्मा हमेशा प्रेम की बात करती है, भेदभाव की नहीं, इसकी या उसकी नहीं। जिस दिन ये मन मौन हो जाएगा उस दिन हृदय के अंदर आत्मा की सुनने लग जाएंगे। फिर हम संसार में रहने वालों से प्रेम करना सीख जाएंगे। ये किसी सम्प्रदाय समाज की बात नहीं है। यह शास्त्रों के गहरे रहस्यों की बात है।
गीता में भगवान ने कहा है कि इस रहस्य को जानकर जब मन की छोड़कर आत्मा की करेंगे तब परमात्मा की इस प्रकृति से प्रेम करने लग जाएंगे फिर न हम इस प्रकृति का दोहन करेंगे न शोषण करेंगे केवल और केवल पोषण ही करेंगे।
रोशनलाल गोरखपुरिया
लेखक, आध्यात्मिक विचारक,
सामाजिक कार्यकर्ता
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